Thursday, August 22, 2024

सावरकर के सामाजिक क्रांतिकारी विचार: औपनिवेशिक ब्रिटिश और उनके उत्तराधिकारियों के हाथों में एक सुविधाजनक हथियार!

सावरकर के 'हिंदुत्व' से सीखा जा सकता है कि उन्होंने न केवल इसके बारे में लिखा, बल्कि लगभग एक सदी पहले अपने जीवन में भी इसका पालन किया। सावरकर एक महान समाज सुधारक थे जिनका दृढ़ विश्वास था कि सामाजिक एवं सार्वजनिक सुधार बराबरी का महत्त्व रखते हैं व एक दूसरे के पूरक हैं।

सावरकर के समय में समाज बहुत सी कुरीतियों और बेड़ियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था, जिसके कारण हिन्दू समाज बहुत ही दुर्बल हो गया था। उन्होंने अपने भाषणों, लेखों व कृत्यों से समाज सुधार के निरंतर प्रयास किए। उनका समाज सुधार जीवन पर्यन्त चला और उनके सामाजिक उत्थान कार्यक्रम ना केवल हिन्दुओं के लिए बल्कि राष्ट्र को समर्पित होते थे।

सावरकर के अनुसार हिन्दू समाज सात बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

1. स्पर्शबंदी: तथाकथित निम्न जातियों का स्पर्श तक निषेध, अस्पृश्यता
2. रोटीबंदी: तथाकथित निम्न जातियों के साथ खानपान निषेध
3. बेटीबंदी: खास जातियों के संग विवाह संबंध निषेध
4. व्यवसायबंदी: कुछ निश्चित व्यवसाय निषेध
5. सिंधुबंदी: सागरपार यात्रा, व्यवसाय निषेध
6. वेदोक्तबंदी: वेद के कर्मकाण्डों का एक वर्ग को निषेध
7. शुद्धिबंदी: किसी को वापस हिन्दूकरण पर निषेध

सावरकरजी हिन्दू समाज में प्रचलित जाति-भेद एवं छुआछूत के घोर विरोधी थे।  सावरकर 1924 से 1937 तक रत्नागिरी में नजरबंद रहे। उन्होंने सामाजिक सुधार पर ध्यान केंद्रित किया और महारवाड़ा या महारों की बस्ती का सर्वेक्षण किया, जो हिंदुओं में एक पूर्व, तथाकथित अछूत निम्नजाति थी। उन्होंने जाति-आधारित अलगाव की प्रथा की निंदा करते हुए भाषण दिए, सुनिश्चित किया कि स्कूलों में तथाकथित निम्न जातियों के बच्चे अनिवार्य रूप से स्कूल जाएँ। उन्होंने भजन या हिंदू भक्ति गीतों का सामूहिक गायन शुरू किया। उन्होंने रत्नागिरी के आस-पास के छोटे शहरों जैसे दापोली, खेड़, चिपलून, देवरुख, संगमेश्वर, खारेपाटन, देवगढ़ और मालवन का दौरा किया और जाति-आधारित अलगाव की प्रथा की निंदा करते हुए भाषण दिए और सुनिश्चित किया कि इन जगहों के स्कूलों में यह घातक प्रथा बंद हो। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि महार, चमार और भंगी या वाल्मीकि जैसी तथाकथित निम्न जातियों के बच्चे अनिवार्य रूप से स्कूल जाएँ, इसके लिए उन्होंने चाक और स्लेट वितरित किए और उनके माता-पिता को मौद्रिक प्रोत्साहन दिया।  उन्होंने छुआछूत को खत्म करने के लिए विभिन्न जातियों के लोगों के साथ त्योहारों के अवसर पर कई घरों में गए और पारंपरिक मिठाइयाँ वितरित कीं। उन्होंने हिंदू महिलाओं की सामूहिक हल्दी-कुमकुम सभाएँ आयोजित कीं और तथाकथित निम्न जातियों की महिलाओं को तथाकथित उच्च जातियों की महिलाओं को कुमकुम लगाने की सुविधा दी। उन्होंने तथाकथित निम्न जातियों को अपने नाटकों के निःशुल्क पास दिए ताकि वे अन्य जातियों के लोगों के साथ स्वतंत्र रूप से घुल-मिल सकें। उन्होंने आर्थिक सहायता दी और तथाकथित निम्न जातियों का एक संगीत बैंड बनाया। उन्होंने सभी जातियों के हिंदुओं के लिए खुले रेस्तरां शुरू किए और सामूहिक अंतर-जातीय भोजन का आयोजन किया। उन्होंने अस्पृश्यता की मूर्ति की होली जलाई और डॉ. अंबेडकर के अभियान में उनका साथ दिया। रत्नागिरी से रिहा होने के बाद भी उन्होंने सामाजिक सुधार के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी।

बम्बई का पतितपावन मंदिर इसका जीवन्त उदाहरण है, जो हिन्दू धर्म की प्रत्येक जाति के लोगों के लिए समान रूप से खुला है। पिछले सौ वर्षों में इन बन्धनों से किसी हद तक मुक्ति सावरकर के अथक प्रयासों का भी परिणाम है। सावरकर एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जो सभी जातियों के हिंदुओं के लिए स्वतंत्र रूप से खुला हो। उन्होंने कहा, 'मेरे मन में यह विचार कुछ समय से था। दरअसल, मंदिर सभी जातियों के हिंदुओं के लिए दर्शन के लिए खुले होने चाहिए। जन्म-आधारित जाति भेद के आधार पर किसी भी हिंदू को प्रवेश से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इस मंदिर का पुजारी जन्म से ब्राह्मण होना आवश्यक नहीं है। मंदिर का एक ट्रस्ट होगा। ट्रस्टियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और तथाकथितअछूत समुदायों से एक-एक सदस्य  होगा। इस प्रकार इस मंदिर की मुख्य विशेषता सभी हिंदुओं को समान अधिकार प्रदान करना होगा। सावरकर ने आगे कहा, “इस विशेषता के बिना, एक नया मंदिर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह समुदाय, जिसके पास अपने मौजूदा मंदिरों की रक्षा करने की ताकत नहीं है, उसे नए मंदिर बनाने का कोई अधिकार नहीं है। इस मंदिर का उद्देश्य यह ताकत देना है। आज केवल महार, चमार और अछूत समुदाय ही नहीं गिरे हैं (पतित हो गए हैं), बल्कि पूरा हिंदू समाज जो विदेशी जुए के अधीन था, गिर गया है। जो इस पूरे पतित हिंदू राष्ट्र को बचाए, मैं उसे पतितपावन कहता हूं)। जो वह सब वापस देता है जो हम हिंदुओं ने खो दिया है, मैं उसे पतितपावन कहता हूं।” इसके बाद सावरकर द्वारा लिखित 'हिंदू एकता' गीत गाया गया। अंत में, इस अनूठे मंदिर की आधारशिला रखी गई।

उपसंहार:सावरकर के राजनीतिक क्रांतिकारी विचारों के कारण, वे औपनिवेशिक ब्रिटिश और उनके दलालों के निशाने पर थे। इसी तरह, उनके सामाजिक क्रांतिकारी विचारों और आंदोलन के कारण, वे डॉ. अम्बेडकर की तरह, औपनिवेशिक ब्रिटिश मास्टर्स के साथ जुड़े हुए तथा कांग्रेस पृष्टभूमि के, तथाकथित उच्च जाति के हिंदुओं के निशाने पर थे। यह औपनिवेशिक ब्रिटिश और उनके उत्तराधिकारियों के हाथों में एक सुविधाजनक हथियार बन गया, जिन्होंने इस संबंधित दूरी का शोषण करके उन्हें भारतीय राजनीति के हाशिए पर धकेल दिया गया था, जब तक कि हाल के समय में औपनिवेशिक दलालों ने अपने दुराचारों के कारण खुद को उजागर नहीं कर दिया l लोग अब ऐसे उपनिवेशी ब्रिटिश चापलूसों के, फर्जी प्रचार को देख पा रहे हैं। 



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